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GATHWALA (गठवाला - मलिक) KHAP


#गठवाला_मलिक_खाप जिंदाबाद।

#मलिक_गोत्र

#गठवाला_मलिकों के 42 गांव जिला रोहतक - सोनीपत में, जिला- मुज़फ्फ़रनगर / शामलींं में 52 गांव, जिला- जीन्द में 12 गांव, जिला- हिसार में 7, जिला- मेरठ में 3 गांव हैं। यूपी के कई जिलों में #मलिकों के बहुत गांव हैं! इन लल्ल गठवाला मलिकों के रक्तभाई सोमवाल गठवालों के 45 गांव उत्तरप्रदेश के कई जिलों में हैं।

पाकिस्तान में मुस्लमान जाट मलिकों की बड़ी संख्या है। जिला रोहतक में मलिकों के गांव मोखरा (आधा) (सिक्ख जाटों में भी मलिकों की संख्या है।) गांधरा , खरावड़ (कलावड़), कारोर , अटाल और डाबोदा खुर्द है। जिला सोनीपत की गोहाना व सोनीपत तहसीलों में

गठवाला मलिकों के मुख्य गांव ये हैं -

आहुलाना , छिछड़ाना , मदीना , रूखी, काहनी पुट्ठी, खानपुर, गामड़ी, जसराना, बीधल , भैंसवाल , रभडा़ , माहरा (ठसका), दोदवा , सर्गथल , मिर्जापुर खेड़ी , ईसापुर खेड़ी , बिलबिलान , आंवली , रिवाड़ा आदि गांव तहसील गोहाना में हैं।

पिनाना , तिहाड़ , सलारपुर माजरा , महमूदपुर माजरा , तेवड़ी , सरढाना , पुगथला , भटाना , जुआ माहरा , डबरपुर, भगान , पीपली खेड़ा , तुराली आदि गांव तहसील सोनीपत में हैं।

जिला पानीपत में उग्राखेड़ी , सींख , पाथरी , रिसालू , निम्बली , कुटानी , राजाखेड़ी , बुवाना लाखू आदि 20 गांव, जिला हिसार में उमरा, सुलतान आदि 7 गांव मलिकों के हैं।

यहीं से जाकर पीलीभीत में ऐमी , बरेली में सलथा , तिलमाची , दौलतपुर , टाण्डा आदि गांव बसे। ये अपने

जड़िया नामक पूर्वज से जड़िया मलिक कहलाते हैं। बिजनौर में गाजीपुर , सुन्दरपुर , रावणपुर , धौकलपुर , मीरपुर , रैंहटी , मुरादाबाद में लोदीपुर , मेरठ में हिसावदा , कसरैली , पसवाड़ा आदि गांव गठवाला मलिकों के हैं।

जिला रोहतक के कहलावड़ गांव के चौ० फूलसिंह मलिक ने यहां से

जाकर जिला मेरठ में यह हिसावदा गांव बसाया था। ऋषिक तुषारवंश के शाखा

गोत्र - 1. गठवाला-मलिक 2. सोमवाल 3. जड़िया । लल्ल गठवाला मलिक वंश

सौन्दर्य और शारीरिक गठन व सामाजिक संगठन की दृष्टि से प्राचीन आर्यों के सच्चे स्मारक हैं। आजकल ये लोग गोहाना और सोनीपत तहसीलों में संघ रूप से बसे हुए हैं।

प्राचीन जनपदों के सुन्दर उदाहरणस्वरूप इस वंश के इन

गांवों के बीच अन्य जाट वीरों का किसी वंश का कोई गांव नहीं है। चौधरी गिरधरसिंह मलिक थे जो सारे गठवालों में दादा के नाम से प्रसिद्ध हुए। इनका निर्णय सारी खाप को सर्वमान्य था। इनके पुत्र जमुना सिंह मलिक थे। जिनकी आज्ञाओं का पालन यमुना नदी पार तक पूज्यभावों से किया जाता था। चौधरी जमुनासिंह मलिक दादा के पुत्र चौ० घासीराम मलिक एम०एल०सी० थे। आप को ब्रिटिश शासनकाल में राज्य और प्रजा दोनों में महान् आदर प्राप्त हुआ।

सरकार की ओर से आप को राव बहादुर की पदवी दी गई। आप भी सब मलिकों के 'दादा' कहे जाते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य जाट व दूसरी जाति के लोग

इनको दादा घासीराम कहकर पुकारते थे। दादा घासीराम

मलिक के पुत्र मातूराम भी मलिकों के 'दादा' कहे जाते

थे। आज आप के पुत्र चौधरी भल्लेराम मलिकों 'दादा' कहे जाते हैं। दीपालपुर से आकर रोहतक-सोनीपत में मलिकों ने जब से निवास किया, तब से आहुलाना गांव गठवाला मलिकों की खाप का प्रधान गांव रहता आया है और आज भी है। उपर्युक्त 'दादा' कहे जाने वाले महान् पुरुष इसी गांव के निवासी थे। ट्राइब्स एण्ड कास्ट्स आफ दी नार्थ वेस्टर्न प्राविन्सेज एण्ड अवध के लेखक मि० डब्ल्यू क्रुक साहब ने लिखा है कि “मलिक गठवालों का मुख्य स्थान आहुलाना था। इनके पड़ौसी राजपूतों से निरन्तर युद्ध होते रहे जिनमें ये सफल हुये। इसलिये

अन्य जाटों ने इनको ‘प्रधान’ मान लिया। दिल्ली के

बादशाह ने मंदहार (मिडाण) राजपूतों को दबाने के लिये

इनको सहायतार्थ बुलाया था। विजयी होने पर इन्हें मलिक की उपाधि दी गई। एक बार धोखे से मन्दहारों ने उन्हें बुलाकर बारूद से उड़ा दिया। बचे हुए ये लोग हांसी के पास दीपालपुर चले गये और उसको अपनी राजधानी

बनाया। हरिराम bhaat ki pothi के

लेखानुसार “इब्राहम लोधी

(सन् 1517-1526 ई०) के सगे भाई जलालुद्दीन लोधी ने बगावत कर दी।

इसको दबाने के लिये इब्राहीम ने गठवाला मलिकों से मदद मांगी।

गठवाला लल्ल गोत्री नौजवानों ने दहिया खाप और उनके साथी अहलावत खाप और तंवर वंश, रघुवंश, पंवारवंश इत्यादि खापों (सब जाटवंश) का सर्वखाप पंचायत के नाम पर जाटों का बड़ा दल इकट्ठा किया।

इस जाटदल ने बादशाह इब्राहीम लोधी की ओर होकर जलालुद्दीन को हरा दिया जो जान बचाकर भाग गया। दूसरी लड़ाई में वह मारा गया। मलिकों की इस मदद और

वीरता से प्रसन्न होकर बादशाह इब्राहीम ने इनको मलिक की उपाधि दी।

जिला मुज़फ्फ़रनगर में गठवाला मलिक - मुज़फ्फ़रनगर जिला लल्ल गठवाला मलिक वंश के लिए रोहतक-सोनीपत के बाद सर्वाधिक महत्त्व रखता है।

जिला सोनीपत के एक गांव में चौ० पाथू मलिक रहते थे।

जिनके चार पुत्र नैया, मल्हण, कक्के और देवसी नामक थे।

नैया नाराज होकर अपने घर से यमुना पार कैराना व कांधला के पास कैथरा (काहनान) गांव पहुंचा। यह गांव भिण्ड तंवर जाटों का था जहां वह उस गांव के जमींदार बोहरंग राव भिण्ड-तंवर गोत के जाट के घर में रहने लग गया। उस समय दिल्ली पर सैय्यद वंश के बादशाह का राज्य था जिसकी नींव खिज्रखां ने सन् 1414 ई० में तुगलक वंश को समाप्त करके डाली थी और वह सन् 1414 ई० से 1421 ई० तक दिल्ली सल्तनत पर शासक

रहा था। इस सैय्यद वंश का राज्य 1451 ई० तक रहा था।

बोहरंग राव जाट ने अपनी पुत्री मलूकी का विवाह नैया

से संवत् 1483 (सन् 1426 ई०) में कर दिया और उसके नाम अपनी सारी भूमि व सम्पत्ति करवा दी। बोहरंग राव की इस मलूकी के अतिरिक्त और कोई सन्तान न थी। इसलिए नैया को अपने घर रख लिया। इससे

नाराज होकर [Kaithra|कैथरा

गांव]] के भिण्ड तंवर जाटों ने संवत् 1487 (सन् 1430 ई०) में

नैया को खेतों की एक जोहड़ी में कत्ल कर दिया। इस

घटना के पश्चात् नैया की विधवा ने सोनीपत में मलिकों के प्रधान गांव आहुलाना में स्वयं पहुंचकर मलिकों के ‘दादा’ से पुकार की। इस अबला की अपील पर समस्त गठवाला खाप ने कैथरा गांव पर धावा करके वहां के भिण्ड-तंवर जाटों को एक-एक करके मार दिया। उनकी केवल

एक गर्भवती स्त्री को छोड़ दिया, जिससे एक लड़का हुआ और उसकी संतान का एक ही घर भिण्ड-तंवर जाटों का वहां है। यह वंश न घटा है न बढ़ा है। मलिकों ने उस कैथरा गांव का नाम बदलकर नैया के नाम पर लिसाड़ रख दिया और नैया की विधवा पत्नी मलूकी का पुनर्विवाह नैया के छोटे भाई देवसी से करवा दिया। जिस

जोहड़ी में नैया का वध किया गया था वहां पर मलिकों ने

नैया की समाधि बनाई जो आज भी है। यह भी निर्णय किया गया कि वहां के मलिकों की चौधर

(प्रधानता) नैया के ही खानदान में रहेगी। मलिकों

की इतनी आबादी बढ़ी कि आज जिला मुज़फ्फ़रनगर में लिसाड़ गांव के आस-पास इनके 52 गांव हैं जिन का प्रधान लिसाड़ गांव में नैया के खानदान का पुरुष होता आ रहा है। उसको भी ‘दादा’ कहा जाता है।

इन लोगों में भी आर्यसमाज का काफी प्रचार है। यहां के मलिकों की चौधर आहुलाना जैसी शक्तिशाली तो नहीं है, तब भी अन्य वंशों की अपेक्षा इनका संगठन

आदर्श है। यहां के मलिक एवं उनका प्रधान ‘दादा’ भी

आहुलाना के ‘दादा’ को बड़ा मानते हैं और समय आने पर इनसे निर्णय करवाते हैं जिला मुज़फ्फ़रनगर में मलिकों की बावनी (52) में खास-खास

गांव निम्नलिखित हैं – लिसाड़ , खिदरपुर , सून्ना , सरनावली , मखलूमपुर, खरड़, सोजनी , खेड़ामस्तान , कुडाना , लांख , हसनपुर, सिरसी खेड़ा , सलपा , फुगाना , खेड़ा , करोदा , कुलहड़ी , महमूदपुर कुरावां , सागड़ी , खेड़ी , डूंगर, सिलाना , चांदनहेड़ी , पट्टीमाजरा , झाल , बरला , कादीखेड़ा , मोघपुर , बधानी , नीमपुर , कुरमाली आदि। मलिकों का यह कुरमाली गांव यू० पी० के जाटों में एक प्रसिद्ध गांव है। लल्ल गठवाला मलिकों ने मन्दहार (मिडाण) के राजपूतों, करनाल के पठानों

और जिला रोहतक में कलानौर के पंवार गोत्री मुसलमान नवाब के अत्याचारों, के विरुद्ध उनके

साथ युद्ध करके विजय प्राप्त करके जाटवीरों की इस

विशेषता को प्रमाणित कर

दिया कि “जाट किसी के द्वारा किये गए अत्याचारों

को सहन नहीं कर सकता और इन के विरुद्ध अपनी जान की परवाह न करते हुए तलवार उठाता है।” कलानौर के नवाब के साथ मलिकों के युद्ध के कारण की मनघड़न्त प्रचलित दन्तकथा की आवश्यकता इसलिए है ताकि लोग असत्य बात को भूलकर सत्य को मानें। दन्तकथा - एक समय कलानौर के राजपूत रांघड़ नवाब के आदेश

अनुसार कलानौर के चारों ओर दूर-दूर तक के हिन्दू अपनी नवीन विवाहित पत्नी को

अपने घर ले जाने से पहले कलानौर का ‘कौला’ पूजते थे।

इसका अर्थ है कि वर वधू वहां नवाब को कुछ भेंट देते थे और वधू को एक रात नवाब के घर ठहरना पड़ता था। एक बार डबरपुर गांव के चौधरी बिछाराम मलिक की पुत्री समाकौर अपने पति जिसका गांव गांगटान (डीघल के समीप) था, के साथ अपनी ससुराल को जा रही थी। अपने पति की कलानौर जाने की आज्ञा को न मानकर अपने गांव डबरपुर पहुंची और अपने

पिता व भाइयों को सारा हाल सुनाकर कहा कि “तुम्हें

लज्जा नहीं आती कि तुम क्षत्रिय होते हुये अपने बहू-

बेटियों को मुस्लमान रांघड़ों के पास भेजते हो।” उसका

पिता घोड़े पर चढकर जाटों की सब खापों में गया और नवाब को मारने की मदद मांगी। जाटों की सब खापों

ने मलिकों के नेतृत्व में नवाब पर आक्रमण किया और उसे मार दिया।

जाटों की पंचायत ने अकबर सम्राट् के एक जाट लड़की से विवाह करने के आदेश को ठुकरा दिया था। (2) सबसे अधिक जाटों के गौरव की यह बात है कि इन्होंने मुस्लमान या किसी अन्य धर्म के किसी मनुष्य को अपनी पुत्रियों का डोला नहीं दिया। इसके प्रमाण अनेक इतिहासकारों की पुस्तकों में लिखे हुये हैं।

(3)

कलानौर के चारों ओर प्रचण्ड वीर जाटों के वे वंश बसे हुये हैं

जिनकी अद्वितीय वीरता के उदाहरणों से देशी व विदेशी

ऐतिहासिक ग्रन्थ भरे पड़े हैं।

(4)

Jat  समझ गये होंगे कि जिस बहादुर जाट जाति ने

विदेशी आक्रमण करने वालों का मुंह तोड़ा था भला एक थोड़े से गांवों का साधारण नवाब जिसका किसी इतिहास में नाम व समय तक भी नहीं लिखा है, उसके पास

ये योद्धा जाटवंश अपनी लड़कियों को कैसे भेज सकते थे? अतः कलानौर का कौला पूजने वाली बात प्रमाणशून्य, बेबुनियाद और असत्य है जो जाटों तथा हिन्दू जाति पर कलंक लगाने के लिए प्रचलित

की गई। सत्य बात यह है जिसके प्रमाण

हैं कि “कलानौर के नवाब ने अपने अधीन हिन्दू जनता पर अत्याचार आरम्भ कर दिये।

इसके विरुद्ध गठवाला मलिकों के नेतृत्व में चारों ओर की जाट खापों ने मिलकर नवाब पर आक्रमण करके उसका

वध कर दिया..

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